थाना लॉर्डगंज में ‘ख़ामोशी’ का काउंटर खुला,अब मूक-बधिर इशारों में दर्ज करवा सकेंगे FIR!
Anam Ibrahim
Journalist007
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जबलपुर थाना लॉर्डगंज में ‘ख़ामोशी’ की FIR: अब हाथ बोलेंगे, और शहर कटघरे में खड़ा होगा
*जनसम्पर्क Life*
जबलपुर जिस शहर में अक्सर चीख़ें भी ट्रैफिक के शोर में गुम हो जाती हैं, वहाँ आज एक नया बोर्ड टंगा मूक-बधिर पुलिस सहायता केंद्र। जी हां दोस्तों कहा गया, अब इंसाफ़ इशारों में भी मिलेगा। सवाल यह है कि जो व्यवस्था बरसों से सुनकर भी नहीं सुनती, वह अब देखकर क्या देखेगी?
क्राइम रिपोर्टिंग की दुनिया में एक पुराना मुहावरा है “जो बोल नहीं सकता, वह आंकड़ा बन जाता है।” बहरहाल ख़बर को आगे बढ़ाते हैँ
17 फरवरी 2026 को थाना लॉर्डगंज के परिसर में फीता कटा और दावा हुआ कि अब मूक-बधिर नागरिक भी सीधे पुलिस से संवाद कर सकेंगे।
तो पढ़िए इस ख़ास ख़बर को अंत तक बस एक क्लिक के बाद सिर्फ़ *जनसम्पर्क Life*
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इस पहल की नींव सितंबर 2025 में पड़ी थी, जब पुलिस अधीक्षक जबलपुर सम्पत उपाध्याय की मौजूदगी में ‘सक्षम ऑरगनाईजेशन’ ने वर्दीधारियों को बेसिक सांकेतिक भाषा का प्रशिक्षण दिया। उंगलियाँ मुड़ीं, हथेलियाँ खुलीं, इशारे बने और कहा गया कि अब दर्द की भाषा समझी जाएगी।
लेकिन हुज़ूर, दर्द की भाषा सिर्फ़ हाथों से नहीं समझी जाती दिल भी चाहिए।
बयान बनाम बयानात
अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक शहर आयुष गुप्ता और डॉ. जितेन्द्र जामदार ने इस केंद्र का शुभारंभ किया। माइक पर शब्द थे नागरिक-हितैषी सेवाएँ संवेदनशील पुलिसिंग सहज संवाद।
बयान पढ़ते-पढ़ते लगा जैसे इंसाफ़ अब सरकारी प्रेस-नोट की भाषा में मुस्कुरा रहा है।
लिहाज़ा यह केंद्र शिकायत दर्ज करेगा, मार्गदर्शन देगा, पुलिस सहायता उपलब्ध कराएगा काग़ज़ पर सब मुकम्मल है।
पर असली इम्तिहान उस दिन होगा, जब कोई मूक-बधिर लड़की कांपते हाथों से दुष्कर्म की कहानी सुनाएगी।
जब कोई बेजुबान मज़दूर इशारों में बताएगा कि उसका हक़ किसने निगल लिया।
जब किसी घर की चारदीवारी में हुए जुल्म की गूंज हथेलियों से निकलेगी।
तब वर्दी इशारा समझेगी या फिर वही पुराना जुमला दोहराएगी
सबूत कहाँ है?
समाज, तू भी कटघरे में है
सच तो यह है कि हम सब इस खबर में मुल्ज़िम हैं।
हमने बरसों तक मूक-बधिर लोगों को बेचारा कहकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ा।
हमने उनकी खामोशी को उनकी तकदीर समझ लिया।
आज अगर पुलिस ने एक काउंटर खोल दिया है, तो यह सिर्फ़ प्रशासनिक कदम नहीं यह हमारे समाज की सामूहिक शर्म का इज़हार है।
थाना प्रभारी नवल सिंह आर्य और पूरा स्टाफ मौजूद था। तस्वीरें खिंचीं, तालियाँ बजीं।
मगर तस्वीरों से ज्यादा ज़रूरी है वो भरोसा, जो अभी पैदा होना बाकी है।
अनम आख़िरी सवाल
खबर यह नहीं कि एक सहायता केंद्र खुला है।
खबर यह है कि हमें 2026 में आकर याद आया कि इंसाफ़ की ज़ुबान सिर्फ़ आवाज़ नहीं होती।
अगर यह पहल सच में जिंदा रही, तो समझिए जबलपुर की सड़कों पर पहली बार खामोशी ने गवाही दी है।
और अगर यह भी फाइलों में दब गई
तो इतिहास लिखेगा कि हमने खामोशी को भी काग़ज़ी बना दिया।
इंसाफ़ अब इशारों में है जनाब।
देखना यह है व्यवस्था उसे पढ़ती है या फिर से अनसुना कर देती है।
