【 RNI-HIN/2013/51580 】
【 RNI-MPHIN/2009/31101 】
02 Jan 2026

चार चाकू,दो स्कूटियाँ और एक लाश,सिविल लाइन जबलपुर,क़ानून ने फिर आंखें बाँध ली!!
Anam Ibrahim
7771851163
अठारह बरस की उम्र में रंजिश का पीएचडी थिसिस पूरा हुआ,
पुलिस को लाश मिली, शहर को आदत
जनसम्पर्क Life
नेशनल न्यूज़पेपर
Jabalpur/Mp: जबलपुर की सिविल लाइन उस शाम भी वैसी ही थी
न सड़कें शर्मिंदा थीं, न बत्तियाँ बुझीं।
बस एक लड़का था, मोनू झारिया, उम्र अठारह
जो अभी ज़िंदगी के फ़ॉर्म भर ही रहा था कि मौत ने बिना दस्तख़त के मंज़ूरी दे दी।
रामलला मेडिकल के पास खड़े होकर बात करना
इस शहर में कोई जुर्म नहीं,
मगर अगर बात करते-करते
किसी की पुरानी रंजिश की फ़ाइल खुल जाए
तो चाकू अपनी भाषा बोलने लगते हैं।
दो गाड़ियाँ आईं।
मुँह ढँके हुए थे
शर्म से नहीं, पहचान से।
हाथों में चाकू और बका ऐसे चमक रहे थे
जैसे मोहल्ले की गलियों में
इंसाफ़ का नया सिलेबस पढ़ाया जा रहा हो।
पहले गालियाँ दी गईं
क्योंकि हमारे समाज में
क़त्ल से पहले चरित्र हत्या ज़रूरी होती है।
फिर वार हुए।
एक नहीं, कई।
इतने कि शरीर से पहले
उम्र गिर पड़ी।
मोनू वहीं ढेर हो गया।
हमलावर भाग गए
जैसे इस शहर में
क़ातिलों को नहीं,
लाशों को पकड़ा जाता हो।
विक्टोरिया अस्पताल पहुँचा तो
डॉक्टर ने वही सरकारी कविता दोहराई
मृत घोषित।
यहाँ मौत भी फाइल नंबर से पहचानी जाती है।
रंजिश: सबसे सस्ता हथियार
पुलिस की तफ्तीश में जो निकला
वो नई कहानी नहीं थी।
दशहरे पर आर्यन पर हमला हुआ था
तब से बदले की खेती चल रही थी।
बीज पुराने थे,
ख़ून अब काटा गया।
आर्यन, तुषार उर्फ़ रंगा, नवीन, साहिल
उम्र अठारह से बीस।
इतनी कम कि वोट ठीक से नहीं डाला,
और इतनी ज़्यादा कि
क़त्ल की पूरी योजना बना ली।
एक्सिस स्कूटी,
दो पहिए,
चार ज़िंदगी से उधार लिए हुए वहशी दिमाग़
और बीच में अकेला मोनू।
चाकू चला।
आर्यन और बॉबी ने हाथ गंदे किए,
बाक़ी पहरेदार बने।
फिर सब भाग गए
जैसे यह कोई मोहल्ले की लड़ाई नहीं,
रोज़मर्रा का काम हो।
पुलिस का हिस्सा
सीसीटीवी फुटेज खंगाले गए
शहर की आँखें अब कैमरे हैं,
मगर दिमाग़ अब भी बंद।
चार गिरफ़्तार हुए।
एक चाकू, दो स्कूटियाँ ज़ब्त हुईं।
कुछ नाम अब भी फरार हैं
क्योंकि हर केस में
थोड़ी अधूरी कहानी ज़रूरी होती है।
अफसरों की फौज लगी,
नामों की लिस्ट लंबी है
जैसे मेहनत भी
अब गिनती में मापी जाती हो।
अंत में एक सवाल (जो प्रेसनोट नहीं पूछता)
यह हत्या सुलझ गई।
फाइल बंद हो जाएगी।
चार लड़के जेल जाएँगे।
एक माँ रोएगी
और शहर अगली वारदात तक चैन से सो जाएगा।
मगर सवाल यह है
क्या हम ऐसे ही अठारह साल के लड़कों को
रंजिश, चाकू और स्कूटी सौंपते रहेंगे?
Pc मे Anam होते तो कहते
“यह जुर्म नहीं, तहज़ीब है।”
“समाज अपराध पैदा करता है,
पुलिस बस रजिस्टर भरती है।”
और सिविल लाइन की सड़क आज भी कहती है
अगली लाश का पता बताओ,
हम तैयार हैं।
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