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अपने ही घर में असुरक्षा के चलते ख़ौफ़ के साए में आई दलितो की बस्ती!!!

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Anam Ibrahim

आख़िर सिंधिया क्यों करवा रहे है: दहस्तज़दा दलितों को पलायन? क्या डर के चलते अब पीड़ित दलित फ़रियादी को करना पड़ेगा स्थान परिवर्तन!!?

जनसम्पर्क -life

चुनावी हार से भी नही हुए सिंधिया लाचार: क्या सूबे की सरकार के सहारे अफ़सरो पर धौस जमा झाड़ रहे हैं रौब ?

मध्यप्रदेश (शिवपुरी): थोड़ा ही तो वक़्त गुज़रा था, अभी भावखेड़ी नामक गाँव के ज़ख़्म भरे भी नही थे, जहां ख़ामोशी तोड़ते ही गांव की हर ज़ुबान बता रही थी की दलितों के दर्द के घाव अभी तक ताज़ा हैं। उनके कमज़ोर बच्चो की दर्द से बिलखती सिसकियां अब भी गांव के ख़ुशनुमा बनते मौसम को ख़ौफ़ज़दा बना देती हैं। जब-जब दहशत का वो दिन याद बनकर कमज़ोर दलित परिवार के दो बच्चे अविनाश रौशनी की बेदर्दी से पीट-पीट की गई हत्या की दास्तां सुनाता है तो गांव की गली की हर दर-ओ-दीवार खिड़कियां व रास्तों पर भी सन्नाटे पसर जाते हैं। जहां दलितों के पीड़ित भयभीत परिवार को उनके ही घर बस्ती गांव में कट्टरजादो से महफ़ूज़ रखने के लिए सुरक्षा मुहैया करवाना चाहिए था तो वहीं पूर्व सांसद चुनाव हारे हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया। अपनी दम तोड़ती सियासत को सूबे की सत्ताभाई सरकार के सहारे बूस्टर डोज़ दिलवाने की मंशा लिए भयभीत दलितों की बस्ती में पहुँच गए जहां सत्ताभाई सरकार से डरे हुए पीड़ित दलित परिवार को सुरक्षा मुहैया करवा निर्भय होकर क़ानून व्यवस्थाओं की प्रति विश्वास जगाना चाहिए था तो वही सिंधिया द्वारा पीड़ित परिवार को उनके ही घर में भयमुक्त व्यवस्था उतपन्न करवाने की जगह स्थान परिवर्तन करवा दिया गया और शासकीय अफ़सरो को हिदायत भी दी गई कि जल्द ही पीड़ित दलित परिवार को अस्थाई आवास दिया जाए लिहाज़ा अस्थाई आवास का इंतज़ाम भी हो गया जिसके बाद सिंधिया द्वारा ख़ौफ़ज़दा दलित परिवार को गांव से दूर दूसरे शहर मे शिफ्ट कर दिया, क्या ये सहीं क़दम है? तो देखते हैं की सिंधिया की क्या मंशा थी। अगर दलित ग़रीब को घर देने की थी तो अच्छी बात है लेकिन एक अच्छी बात से भी जुड़ी बहुत अच्छी बात थी कि उनको ये इन्तेज़ाम ग़रीब बेघर दलितों की छत्रछाया की व्यवस्थाओं के लिए सामूहिक शक़्ल में चलाना चाहिए था लेकिन सिर्फ़ एक ही भयजदा अस्थाई निवासी दलित परिवार को ही खुद के गांव से बेदख़ल करवा सुरक्षा इंसाफ़ की जगह अस्थाई आवास क्यों दिया गया??अगर इसी तरह प्रदेश के हज़ारों गांव, देहात, क़स्बों, क़बीलों की भारीभक्कम संख्या के भीतर कई जाती के लोग ऐसे है जिनकी संख्या उनके जन्मस्थल जन्मग्रह जन्मस्थान मौहल्ले में मुठ्ठीभर भी नही है जिनका परिवारिक जीवन दशक से नही सदियों से जिंदा सबूत है। अगर भारत की किसी भी बस्ती में कम तादात वाली जाती के हो और आप का सामना आपकी जाती के नाम पर जुल्म ज़्यादती से हो साथ ही आप के घर के मासूम बच्चों को कोई सुबह सुबह आप के ही घर के निकट आप की गैर मौजूदगी में जानवरो से भी ज़्यादा जल्लादी ज़ालिम बन पीट-पीट कर मासूम बच्चों का दम घोट मार डाले जिसके बाद सिंधिया जैसी सियासी शख़्सियत गम में डूबे गांव की गहराई में गोता लगाना कूद गए। लिहाज़ा मासूमों की मौत का मातम ख़त्म भी नही हो पाया था, घर के हर कौनो से उनकी चहकती आवाज़े जुदा भी नही हो पाई थी, क़ातिल कट्टरजादो को अभी सजा भी नही मिल पाई थी, इंसान ने फ़रियादी की उंगली भी नही पकड़ी और सिंध्या ने सत्ताभाई हुक़ूमत के अफ़सरो द्वारा फ़रियादी को इंसाफ़ परोस राहत राशि देते हुए उनके घर पर ही सुरक्षा मुहैया करवाना चाहिए थी जिससे कि क़ानून सुरक्षा व्यवस्था पर हर आम आदमी को एहेतबर हो सके। इस तरह हर कमज़ोर पीड़ित को हुक़ूक़त से जुड़े जबड़े दबोच दबोचकर उनकी बहुसंख्यक बस्ती में बसाने लगे तो भारत के इस राज्य के हर शहर में भी जाति के आधार पर एक राज्य तैयार हो जाएगा।

मध्यप्रदेश


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