यह चुनाव नेताओं से क्या-क्या नहीं करवाता

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फिरोजा खान

नई दिल्ली/भोपाल। लोकसभा चुनाव अपने पैर पसार रहा है। और इसी के साथ नेताओं की फौज अपने राज महलों से निकलकर जनता का रुख करने लगी है। कुछ नेता तो ऐसे हैं जो जनता के सामने ऐसे पेश हो रहे हैं कि इनसे प्यारा, भोला और हमदर्द इंसान दुनिया में कोई नहीं है। बेचारी भोली—भाली जनता करे भी तो क्या करे। यह तो चुनावी मौसम की मेहरबानी है कि मंत्रियों को जनता के साथ—साथ मंदिर—मस्जिद की भी याद आ जाती है। चुनाव के मौसम में बारिश, धूप, सर्दी का भी इन नेताओं पर कोई असर नहीं पड़ता। चुनावी मौसम में नेताओं के बीच खुद को गरीब, मजलूमों का सबसे बड़ा हमदर्द बनने की होड सी मची रहती है। चुनावी मौसम में वह नजारे भी देखने को मिल जाते हैं जिसको देखने की हम कल्पना भी नहीं कर सकते। पर अफसोस यह बस कुछ पलों के लिए ही होता है। चुनाव चले जाने के बाद सब चकना चूर हो जाता है।

अभी—अभी एक ताजा वाक्या सामने आया है। दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रविवार को प्रयागराज पहुंचे जहां उन्होंने पवित्र संगम में डुबकी लगाकर पूजा पूजा-अर्चना की और फिर दुग्धाभिषेक किया। यहां मोदी ने पांच सफाईकर्मियों के पांव पखारे। पैर धोकर उनके पांव पोछे। साथ ही पीएम मोदी ने कुंभ मेले में उनके विशेष योगदान के लिए उन्हें सम्मानित किया मोदी के इस कदम की राजनीतिक गलियारों और आम जनता में अपने-अपने हिसाब से चर्चा की जा रही है। एक तबका इसे एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक संदेश बता रहा है। साथ ही आलोचना भी की जा रही है कि चरण धोने की बजाय प्रधानमंत्री को उनके लिए रोजगार की व़्यवस़्था करनी चाहिए।

मोदी का यह तुच्छ दिखाकर खुद को महिमामंडित करने जैसा है। अगर मोदी को सफाई कर्मियों और दलितों का सम्मान ही करना था तो पैर धोने के बजाए उनसे हाथ मिलाना था। पैर धोने से कौन ग्लोरिफाई होता है। प्रधानमंत्री ही ग्लोरिफाइ होते हैं। मोदी सफाईकर्मियों के पांव पकड़कर यह संदेश दे रहे हैं कि आप (सफाईकर्मी) बहुत तुच्छ हैं और मैं महान हूं। इससे किसका फायदा होता है? इनके पैर धोकर वह खुद को महान दिखा रहे हैं। यह बहुत खतरनाक विचारधारा है।

नरेंद्र मोदी को अम्बेडकर का अध्ययन करना चाहिए। संविधान कहता है कि सब बराबर हैं लेकिन जब कोई इस तरह सफाईकर्मियों के पैर धोता है तो यह एक बिल्कुल ग़लत है। यह ड्रामेबाज़ी बन्द होनी चाहिए। दलितों को मैला उठाने के काम में लगाये रखने को ही प्रोत्साहित करने जैसा है। इस तरह पैर धोने से सफाईकर्मी क्या सोचेंगे? यही ना कि मैला ढोना बड़ा महान काम है। मुझे डर है मीडिया में प्रधानमंत्री के चेले उन्हें कृष्ण न बता दें। क्या किसी बेरोज़गार के घर समोसा खा लेने से बेरोज़गारों का सम्मान हो सकता है? उन्हें नौकरी चाहिए न कि प्रधानमंत्री के साथ समोसा खाने का मौक़ा? यह बस मोदी की जनता के वोट पाने के लिए सियासी चाल है। वह लाख दावे करें कि उनका सरोकार जनता से है लेकिन ऐसा बिलकुल भी नहीं है। क्योंकि जनता की समस्या न कभी हल हुई है और न आगे होने की संभावना दिखाई दे रही है।

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