मप्र: प्रशासन की मिलीभगत से रेत मिट्टी का अवैध उत्खनन जोरों पर

अशोकनगर। प्रदेश में खुलेआम रेत, मिट्टी का अवैध उत्खनन जारी है। पुलिस और खनिज विभाग की कोशिशों के बावजूद अवैध उत्खनन नहीं रुक रहा है। बात करें जिले की तो यहां अवैध खनन कार्य बढ़े जोरों से चल रहा है। वहीं इस तरह के कार्य के चलते प्रशासन और खनिज महकमे की उदासीनता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। रेत के अवैध खनन के चलते नदी-नालों की शक्लों-सूरत बदल गई है। कभी जहां गर्मियों के दिनों में भी भरपूर पानी उपलब्ध रहता था, अब वहां नदी पोखरों में ही सिमट कर रह गई है।

सीमेंट-कांक्रीट के निर्माणों में इजाफे के कारण बढ़ी नदियों से लेकर बरसाती नदियों और झोरे-नालों में से भी रेत निकाली जा रही है। वैसे तो नदियों में पानी की उपलब्धता को मिट्टी के उठाव, किनारों से पेड़ों की कटाई, मोटरपंप, इंजन डालकर खेतों की सिंचाई और स्टॉपडेमों से भी नुकसान पहुंचा है, लेकिन सबसे अधिक नुकसान अवैध रूप से रेत खनन के चलते हुआ है। जिसे रोकने की जिम्मेदारी खनिज विभाग की है। इस विभाग की लापरवाही और रेत माफिया के साथ मिलीभगत के चलते जिले भर में सैकड़ों स्थानों पर खदानें बन गई हैं। जहां से वोट, जेसीबी मशीन और मजदूरों द्वारा रेत निकाली जा रही है। जबकि रेत के खनन की जिले भर में बमुश्किल दस अधिकृत खदानें हैं, जिनमें से किसी का भी विधिवत लीज आदेश नहीं हुआ है।

खदान नीलामी की ऑनलाईन प्रक्रिया के बाद एनजीटी, पर्यावरण, प्रदूषण विभाग की एनओसी के बाद खदानें आवंटित की जाती हैं। जिनमें सेकड़ों नियमों के बीच रेत का खनन व विक्रय होता है। इन नियमों को ताक पर रखकर जिले भर में धड़ल्ले से रेत खनन किया जा रहा है और प्रशासनिक अधिकारी हाथ पर हाथ रखे बैठे हैं। ज्यादा समय नहीं हुआ जब नदियों के चलते जिले भर में पानी की कोई किल्लत नहीं होती थी। जिलेभर में करीब दो सौ गांव नदियों के किनारे बसे हुए हैं। इन गांवों के निवासियों के अतिरिक्त शहरी क्षेत्र में भी पेयजल सप्लाई नदियों के माध्यम से होती है। लेकिन नदियों के लगातार दोहन से अब जल के यह प्राकृतिक स्त्रोत दम तोडऩे लगे हैं। इनके संरक्षण के लिए कई एनजीओ और प्रशासनिक इकाई काम कर रहीं हैं लेकिन यह काम भी अन्य शासकीय योजनाओं की तरह कागजों में ही चल रहे हैं।

दुख की बात है कि नदियों के बचाव के लिए स्थानीय निवासी भी आगे नहीं आ रहे हैं, जरा से लालच के चलते प्राकृतिक स्त्रोतों को खत्म करनी दिशा में खतरनाक कदम बढ़ाए गए हैं। नदी, नाले, झोरे, खदान, जहां मिल रही रेत, वहीं खुदाई शुरु बढ़ी नदियों के अलावा छोटी नदी-नालो, झोरों और खदानों से जहां भी रेत की थोड़ी बहुत मात्रा मिलती है, वहीं पर खुदाई शुरू हो जाती है। सिंध में जहां मजदूरों से तो कैथन और बेतवा में वोट लगाकर रेत निकाली जाती है, वहीं कोंचा, मोला, बेलन, ओर, छोंछ, छेवली और घोड़ापछाड़ नदियों में मजदूर लगाकर रेत का खनन किया जाता है। रेत की बढ़ती कीमतों के कारण जिले भर में हजारों मजदूर रेत निकालने का काम कर रहे हैं। जिले भर में ऐसी कई छोटी-छोटी नदियां हैं, जहां रेत की मौजूदगी है।

रेत माफियाओं के हौंसले इतने बुलंद हैं कि खनिज विभाग के अधिकारी भी इन पर कार्रवाई करने से डरते हैं। बेतवा में पानी की अधिकता के चलते वोट से निकाल रहे रेत रेत का सबसे अधिक उत्खनन मुंगावली ब्लॉक में हो रहा है। यहां मल्हारगढ़, हुरैरी पर बने घाटों से वोट लगाकर रेत निकाली जा रही है। बेतवा नदी चंदेरी के पास पहुंचकर राजघाट डेम बनाती है। इसलिए इस नदी में वर्षभर भरपूर पानी रहता हैै। पानी की अधिकता के कारण इस नदी के घाटों पर रेत माफिया द्वारा वोट लगाई गई हैं।

उल्लेखनीय है कि वोट लगाकर रेत निकालना समूचे प्रदेश में प्रतिबंधित है किंतु इन घाटों पर लीज नहीं होने के बाद भी बेखौफ खनन किया जा रहा है। कुछ महीने पहले तक तो प्रशासन, पुलिस व खनिज की टीम द्वारा संयुक्त रूप से छापामार कार्रवाई भी की गईं लेकिन कांग्रेस सरकार आते ही इन अवैध खनन पर बिल्कुल भी कार्रवाई नहीं की जा रहीं हैं।

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