बॉलीवुड के महान शायर जावेद अख्तर की आज सालगिरह है

मुंबई। आज जाने-माने गीतकार और पटकथा लेखक जावेद अख्तर आज 72वां जन्मदिन मना रहे हैं है। 17 जनवरी 1945 को ग्वालियर में जन्में जावेद को उनके चाहने वाले जादू के नाम से पुकारते हैं। दरअसल, उनके पिता मशहूर शायर जान निसार अख्तर की कविता ‘लम्हा-लम्हा किसी जादू का फसाना होगा’, बहुत प्रसिद्ध हुई। बस जब जावेद का जन्म हुआ तो उनके पिता ने उनको जादू के नाम से पुकारना शुरू कर दिया। बाद में जादू से मिलता-जुलता उनका नाम रखा गया जावेद अख्तर।

उनकी मां सफिया अख्तर उर्दू लेखिका और शिक्षिका थीं। जब जावेद अख्तर छोटे थे तो उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली और भोपाल में आ गए। यहीं पर ही जावेद ने कॉलेज की पढ़ाई की और जिंदगी के नए सबक सीखे। जावेद अख्तर 4 अक्तूबर 1964 को मुंबई आए थे। उस वक्त उनके पास न खाने तक के पैसे नहीं थे। उन्होंने कई रातें सड़कों पर खुले आसमान के नीचे सोकर बिताईं। बाद में कमाल अमरोही के स्टूडियो में उन्हें ठिकाना मिला।

जब वर्ष 1981 में निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा अपनी नई फिल्म सिलसिला के लिये गीतकार की तलाश कर रहे थे। उन दिनों फिल्म जगत में जावेद अख्तर बतौर संवाद लेखक अपनी पहचान बना चुके थे। यश चोपड़ा ने जावेद अख्तर से फिल्म सिलसिला के गीत लिखने की पेशकश की। फिल्म ‘सिलसिला’ में जावेद के गीत ‘देखा एक ख्वाब तो सिलसिले हुए और ये कहां आ गये हम..’ श्रोताओं के बीच काफी लोकप्रिय हुए।

फिल्म सिलसिला में अपने गीत की सफलता से उत्साहित जावेद अख्तर ने गीतकार के रूप में भी काम करना शुरू किया। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने एक से बढ़कर एक गीत लिखकर जन जन के हृदय के तार झनझनाए और फिल्मी गीत गंगा को समृद्ध किया। जावेद अख्तर को 5 बार नेशनल अवॉर्ड भी मिल चुका है।

जावेद अख्तर को उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए पदम श्री (1999), पदम भूषण (2007), साहित्य अकादमी अवार्ड (2013) और ना जाने कितने अवार्ड्स से नवाजा गया है और उनका इल्मी और अदबी सफर मुसलसल जारी है, हम उनकी लंबी उम्र के लिए दुआ करते हैं, ताकि उनकी शायरी के जरिए मोहब्बत और इंसानियत का पैगाम आम होता रहे।

Related posts