पुलिस वालों को इंग्लिश नही आने की वजह से युवक ने गुज़ारी रात लॉकअप में!!!

खराब अंग्रेजी के चलते कोर्ट वॉरंट समझने में पुलिस की बड़ी चूक!!

पटना: जहानाबाद विवाहित नीरज नामक हलवाई का अपनी पत्नी के साथ तलाक को लेकर न्यायालय में मामला विचाराधीन था। नीरज की पत्नी अपने जीवनयापन के लिए न्ययालय में न्याय कि गुहार लगा रही थी कि उसे गुजारा भत्ता की शक्ल में पती द्वारा हर माह तय की हुई रक़म प्राप्त हो, जिसके बाद कोर्ट ने नीरज की प्रॉपर्टी की डिटेल्स जानने के लिए वॉरंट ज़ारी कर दिया। जिसे देख पुलिस ने गलती से इसे अरेस्ट वॉरंट समझ नीरज को लॉकअप में ढकेल दिया।
जिसके बाद हलवाई नीरज को पुलिस लॉकअप में ही गुजारनी पड़ गई रात, लिहाज़ा कोर्ट के आदेश छाप फ़रमान की कॉपी पर लिखा हक़ था महज़ ‘वॉरंट’ लेकिन इसे पुलिस ने समझ लिया ‘अरेस्ट वॉरंट’, कोर्ट में हाज़िर होते ही हलवाई को को रिहा कर दिया गया । दरअसल पत्नी के साथ घरेलू आपसी विवाद का केस लड़ रहे एक मिठाई के दुकानदार को सिर्फ पुलिसकर्मियों की खराब अंग्रेजी की वजह से पूरी रात लॉकअप में गुजारनी पड़ गई थी। कम ज्ञान और खुद को महान समझने वाले पुलिसकर्मियों ने कोर्ट के आदेश के ऊपर लिखे वॉरंट को गलती से ‘अरेस्ट वॉरंट‘ समझ लिया ।
इसलिए कोर्ट ने उनकी प्रॉपर्टी की डीटेल्स जानने के लिए वॉरंट दिया था। पुलिस ने गलती से इसे अरेस्ट वॉरंट समझ लिया था।

फैमिली कोर्ट वकील यशवंत कुमार शर्मा ने कहा कि कोर्ट के द्वारा जारी किए गए इस तरह के वॉरंट को ‘डिस्ट्रेस वॉरंट’ कहा जाता है। इसमें पति की प्रॉपर्टी डीटेल्स के मूल्यांकन का निर्देश रहता है। हालांकि इस केस में पुलिस ने इसे अरेस्ट वॉरंट समझ लिया। जहानाबाद के एएसपी (हेडक्वॉर्टर) पंकज कुमार ने कहा, ‘पूरे डॉक्युमेंट में कहीं भी पुलिस को नीरज को अरेस्ट करने के लिए निर्देश नहीं दिए गए थे । नीरज अपनी पत्नी को हर महीने 2500 रुपये का गुजारा भत्ता नहीं दे पा रहे थे, इस वजह से कोर्ट ने उनकी अचल संपत्ति की जानकारी के लिए निर्देश जारी किया था।’

वहीं नीरज कुमार ने कहा, ‘साल 2012 में मेरी शादी के बाद से ही पत्नी के साथ विवाद चल रहा था। पत्नी ने मेरे खिलाफ दहेज का केस भी कर दिया था, जिसके बाद 2014 में मैंने तलाक की अर्जी डाल दी। मेरे ससुर बिहार पुलिस में हैं और उन्होंने मामले को रफा-दफा करने के लिए 10 लाख रुपये मांगे। दहेज के एक केस में पटना कोर्ट ने मुझे 3 साल जेल की सजा भी सुनाई, लेकिन मुझे जमानत मिल गई।
गौर-ए-तलब है कि इस तरह की कई माननीय न्यायालय के आदेशों का अपमान करने वाली अनियमितताएं भोपाल पुलिस की कार्यवाहियों में भी खुल कर नज़र आ रही है जल्द ही मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के मैदानी पुलिस की कुछ कारगुज़ारियों के साथ जनसम्पर्कlife में पढ़े हक़ीक़त हलक तक।

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