न्यायालय के फ़रमान को फ़ाड़, फरियादी के मुंह पर मारने वाले ADM को कलेक्टर शाबाशी देना चाहते है या सज़ा????

Anam ibrahim
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हाल ही होशंगाबाद के कलेक्टर द्वारा ADM को बंधक बनाने के प्रशासनिक मामले कि वारदात का शोर समाज के भीतर अभी शांत भी नही हो पाया था कि भोपाल कलेक्टर द्वारा हाईकोर्ट के आदेश को फाड़कर अपमान करने वाले ADM को बचाने का मामला मुँह बाहर निकालता नज़र आ रहा है।

जनसम्पर्क-life (・_・;)

भोपालः एक ज़ानिब जहां ज़माने भर के बड़े से बड़े अपराधी माननीय न्यायालय के आदेशनुमा फ़रमान को महत्व दे, सर झूका सरेंडर हो जाते हैं तो वही भोपाल के ADM सतीश कुमार एस हाईकोर्ट के आदेश को फाड़ चिन्दियाँ मचाने के मामले में घिरे नज़र आते हैं। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में नेशनल शूटर इमाद शाह ने फ़रियादी बनकर बताया कि वो जब हाईकोर्ट से माननीय न्यायालय का आदेश लेकर भोपाल ADM सतीश कुमार के पास उनकी दफ्तरनुमा अदालत में पहुँचे तो वहां ADM द्वारा माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश का सम्मान कर महत्व देने की जगह न्यायालय के आदेश को फ़ाड़ छोटे-छोटे टुकड़े कर के मैरे ही मुँह पर मार दिए गए फिर जब न्यायालय के निष्पक्ष फरमान के टुकड़ों की तोरन फ़रियादी के चेहरे पर पड़ी तो फ़रियादी संज़ीदगी से शर्मिन्दा होकर मीडिया के बीज आ शिकायत की दुकान खोल के बैठ गया। बहरहाल फ़रियादी द्वारा प्रेसवार्ता के दौरान दावा व दलील पेश की गई है की गुस्साए

ADM द्वारा माननीय न्यायालय के आदेश को पढ़ने के बाद ADM ने उसे दफ़्तर के बाबू की मौज़ूदगी में फ़रियादी के सामने फाड़ के टुकड़े-टुकड़े कर दिया। साथ ही न्यायालय के आदेश पर बागी होते हुए ADM सतीश कुमार ने आपत्तिजनक अपशब्दों का प्रयोग भी आवेश में आ बौखलाकर किया। खैर अबतक ये तो थी फ़रियादी की कारगुज़ारी परन्तु!!

इतने गम्भीर मामले की शिकायत के बाद भी क्लेक्टर कार्यवाही के नाम से बचते व बचाते ख़ामोश होकर कछवा चाल चलते नज़र आए हैं!!!

जबकि क्लेक्टर के काफ़िले में खुद वज़ीर बनकर पसारा समेटने वाले ADM पर ही आज संगीन वारदात को अंज़ाम देने का घिनोना इल्जाम लगा है जो कान-औ-कान कलेक्टर ADM की जुगलबंदी के रिश्ते को महत्व बख्श रहा है। क्या न्यायालय के फ़रमान के बाग़ी ADM और कलेक्टर के बीच रहसमाई रिश्ता है? क्या ADM व कलेक्टर के डस्टबीन में चिंदी के टुकड़ों की तरह रहते है माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश? अगर ऐसा नही था तो तत्काल ADM के ऊपर लगे आरोपो के मामले में ज़ुर्म-ए-मुद्दई बने गवाह के आवेदन को महत्व देकर संज़ीदगी दिखाते हुए तत्काल मामले को गम्भीरतापूर्वक कार्यवाही कि कगार में ला खड़ा कर देना चाहिए था जब कि मौक़ा-ए-वारदात पर सीसीटीवी कैमरों की निगाह आँख फाड़े देख रही थी परन्तु कलेक्टर द्वारा माननीय न्यायालय के आदेश को रुसवा कर अपमानित करने वाले मामले की तस्दीक़ कर कार्यवाही की चपेट में ले आला अफ़सरों के समक्ष पेश करने की जगह ADM पर कोई भी वैधानिक कार्यवाही नही की गई, नाही मामले पर संज़ीदगी दर्ज़ करवाई। बस हिमायत करने की क़वायद पर अड़े रहे। अगर कलेक्टर चाहते तो शिकायत को कार्यवाही के अमल में लाकर जिला प्रशासन के दफ़्तर को मीडिया मंडी में आने से पहले ही रोककर निष्पक्ष कार्यवाही कर सकते थे परन्तु उनके द्वारा बिना तहक़ीक़ के एक पक्षी पक्ष रखने के लफ्ज़ ख़ामोशी में भी फुट रहे हैं जब सिर्फ़ दस मिंट में ADM दफ़्तर के सीसीटीवी कैमरों को खंगाल कर दूध का दूध पानी का पानी किया जा सकता था परन्तु जांच के नाम पर दिखवाने की औपचारिता के हुक्कारे ही कलेक्टर की बातों में नज़र आए।
किस तरह चल रहा है भोपाल कलेक्टर का दफ़्तर???
किस तरह कर रहा है कलेक्टर का प्रशासनिक अमला काम??
कितनी सुनी जाती है फरियादियों की फरियाद??
किस तरह से सियासी अर्दली व भ्र्रष्टाचार के गुज़रते हैं यहां कारनामे???
दर्ज़नो साक्षी फरियादियों की दलीलों के साथ जल्द ही पढ़िए जनसम्पर्क-life में
प्रशासनिक महकमे में पनपते पाप की सत्यता..

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