तिरंगे में लिपटकर विदा हुआ मप्र का ‘लाल’

जबलपुर। जम्मू कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर आतंकी हमले में मध्यप्रदेश का एक जांबाज लाल भी शहीद हो गया था। शहीद अश्विनी काछी का पार्थिव शरीर शनिवार सुबह उनके पैतृक गांव सिहोरा के खुडावल पहुंचा। यहां शहीद अश्विनी को अन्तिम विदाई देने के लिए लोगों का हुजूम उमड़ा है। इस दौरान लोगों में पाकिस्तान के प्रति भारी आक्रोश दिखाई दे रहा है और लोग पाकिस्तान विरोधी नारे लगा रहे हैं।

शहीद अश्विनी काछी का पार्थिव शरीर शनिवार सुबह कटनी के झुकेही से होते हुए सड़क मार्ग से जबलपुर के सिहोरा इलाके के खुड़ावल ग्राम के लिए रवाना हुआ। इससे पहले कटनी पुलिस लाइन में पुलिसकर्मियों समेत शहर के लोगों ने शहीद अशिवनी को श्रद्धाजंलि अर्पित की। इसके बाद शहीद का शव सीआरपीएफ के वाहन से जबलपुर के सिहोरा के लिए रवाना किया गया। सिहोरा पहुंचते ही वाहनों का काफिला शहीद जवान के वाहन के आगे-पीछे चलने लगा। पूरे रास्ते में भारत माता की जय और पाकिस्तान विरोधी नारे गूंजते रहे। इधर, शहीद अश्विनी के घर पर लोगों का तांता लगा हुआ है।

खुड़ावल के लोगों का कहना है कि इस गांव के करीब 40 लोग सेना में हैं, यह शहीदों का गांव है। हम अश्विनी की शहादत को सलाम करते हैं। अश्विनी की शादी के लिए लड़की देख रहे थे घरवाले पुलवामा आतंकी हमले में सीआरपीएफ की 35 बटालियन में पदस्थ अश्विनी कुमार काछी के शहीद होने की खबर जैसे ही गांव मे पहुंची वैसे ही पूरे गाँव सहित जबलपुर में शोक की लहर दौड़ गई। इस कायराना हमले को लेकर परिवार सहित पूरा गांव आक्रोशित है। पुलवामा में शहीद अश्विनी काछी पिता सुकरू काछी की पांच संतानों में सबसे छोटे थे। उनसे बड़े सुमंत, अनिल, अवधेश और बेटी ललिता हैं। अश्विनी अविवाहित था और उसके विवाह की बात चल रही थी।

मां के आंसू थम नहीं रहे

जो मां अपने बेटे के सिर पर सेरा बांधने की तैयारी कर रही थी आज वो मां अपने बेेटे को तिरंगे में लिपटाकर विदा कर रही है। अपने कलेजे के टुकड़े के शहीद होने की खबर सुनने के बाद से ही मां का रो-रोकर बुरा हाल है। वो सुध-बुध खो बैठी है। रह-रहकर अपने बेटे को याद करती हैं और सरकार से बदला लेने की मांग कर रही है। अश्विनी ने अपने दोस्त से कहा था कि वो लड़की देखने आएगा। लेकिन किसे पता था कि वो अब घर तो आएगा, लेकिन तिरंगे में लिपटकर। अपने छोटे भाई को खोने के बाद बड़े भाई भी गमगीन हैं। उनकी आंखें भी रह-रहकर भर आ रही हैं। बात करते-करते गला रुंध जाता है। फिर भी उन्हें फक्र है कि 30 साल की छोटी उम्र में ही भाई देश के लिए शहीद हो गया।

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