जन्मदिन विशेष: भारतीय राजनीति को वैचारिक दिशा देने वाले पुरोधा…पंडित दीनदयाल उपाध्याय

* मारी राष्ट्रीयता का आधार भारत माता हैं, केवल भारत ही नहीं.
माता शब्द हटा दीजिये तो भारत केवल जमीन का टुकड़ा मात्र बनकर रह जायेगा !!*

*यह जरुरी है कि हम ‘हमारी राष्ट्रीय पहचान’ के बारे में सोचते हैं,
जिसके बिना आजादी’ का कोई अर्थ नहीं है!!*

*जब अंग्रेज हम पर राज कर रहे थे, तब हमने उनके विरोध में गर्व का अनुभव किया,
लेकिन हैरत की बात है कि अब जबकि अंग्रेज चले गए हैं,
पश्चिमीकरण प्रगति का पर्याय बन गया है!!*

25 सितम्बर, 1916 को जाने-माने विचारक, दार्शनिक और राजनीतिक पार्टी भारतीय जनसंघ के सह-संस्थापक पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म मथुरा में हुआ था। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जब अपनी स्नातक स्तर की शिक्षा हासिल कर रहे थे उसी वक्त वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के संपर्क में आये और वह आरएसएस के प्रचारक बन गये। हालांकि प्रचारक बनने से पहले उन्होंने 1939 और 1942 में संघ की शिक्षा का प्रशिक्षण लिया था और इस प्रशिक्षण के बाद ही उन्हें प्रचारक बनाया गया था। वर्ष 1951 में भारतीय जनसंघ की नींव रखी गई थी और इस पार्टी को बनाने का पूरा कार्य उन्होंने श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ मिलकर किया था।

दीनदयाल उपाध्याय भारतीय जनसंघ के नेता और भारतीय राजनीतिक एवं आर्थिक चिंतन को वैचारिक दिशा देने वाले पुरोधा थे। यह अलग बात है कि उनके बताए सिद्धांतों और नीतियों की चर्चा साम्यवाद और समाजवाद की तुलना में बेहद कम हुई है। वे उस परंपरा के वाहक थे जो नेहरु के भारत नवनिर्माण की बजाय भारत के पुनर्निर्माण की बात करती है। भारत में ज्ञान के प्रसार-प्रचार एवं संचार की प्रणाली के रूप में कथा और उपदेश पद्धति को पुरातनकाल से स्वीकार्यता प्राप्त है। भगवद् गीता में श्रीकृष्ण ने गीता का ज्ञान उपदेश की पद्धति से दिया तो भगवान बुद्ध ने भी ज्ञान के प्रसार का माध्यम उपदेश को ही बनाया।

आज के दौर में जब संचार के विविध माध्यम उपलब्ध हैं और बात को आम लोगों तक पहुंचाने के विविध तरीके भी खोज लिए गए हैं, बावजूद इसके भारत के आमजन के मानस पटल पर ‘उपदेश अथवा कथा’ पद्धति के प्रति जो विश्वास का भाव है, वो अन्य किसी भी पद्धति के प्रति नहीं है। इस लिहाज से अगर देखें तो दीनदयाल शोध संस्थान द्वारा की जा रही यह शुरुआत पूर्णतया भारतीय भावना के अनुरूप है। 16-18 दिसंबर तक भोपाल में चलने वाले इस आयोजन में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान सहित तमाम और दिग्गज यजमान की भूमिका में होंगे और पेशे से अधिवक्ता एवं संघ के प्रचारक अलोक कुमार कथावाचक की भूमिका में होंगे। इस कथा कार्यक्रम के माध्यम से क्या बताया जाएगा यह तो दो दिवसीय कार्यक्रम में ही पूरी तरह से पता चल जाएगा, लेकिन यह भी गलत नहीं है कि दीनदयाल उपाध्याय के समग्र व्यक्तित्व एवं उनके चिंतन दृष्टि की व्यापकता को दो दिन में समेट पाना आसान नहीं है। उनके विचारों, लेखों, चिंतनशीलता पर वर्षों शोध एवं चर्चा की जा सकती है।

एकात्म मानववाद के रूप में पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने भारत की तत्कालीन राजनीति और समाज को उस दिशा में मुड़ने की सलाह दी है, जो सौ फीसदी भारतीय है। एकात्म मानववाद के इस वैचारिक दर्शन का प्रतिपादन पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने मुंबई में 22 से 25 अप्रैल, 1965 में चार अध्यायों में दिए गए भाषण में किया। इस भाषण में उन्होंने एक मानव के संपूर्ण सृष्टि से संबंध पर व्यापक दृष्टिकोण रखने का काम किया था। वे मानव को विभाजित करके देखने के पक्षधर नहीं थे। वे मानवमात्र का हर उस दृष्टि से मूल्यांकन करने की बात करते हैं, जो उसके संपूर्ण जीवनकाल में छोटी अथवा बड़ी जरूरत के रूप में संबंध रखता है। दुनिया के इतिहास में सिर्फ ‘मानव-मात्र’ के लिए अगर किसी एक विचार दर्शन ने समग्रता में चिंतन प्रस्तुत किया है तो वो एकात्म मानववाद का दर्शन है।

दीनदयाल जी समाजवाद और साम्यवाद को कागजी और अव्यावहारिक सिद्धांत के रूप में देखते थे। उनका स्पष्ट मानना था कि भारतीय परिप्रेक्ष्य में ये विचार न तो भारतीयता के अनुरूप हैं और न ही व्यावहारिक ही हैं। भारत को चलाने के लिए भारतीय दर्शन ही कारगर वैचारिक उपकरण हो सकता है। चाहे राजनीति का प्रश्न हो, चाहे अर्थव्यवस्था का प्रश्न हो अथवा समाज की विविध जरूरतों का प्रश्न हो, उन्होंने मानवमात्र से जुड़े लगभग प्रत्येक प्रश्न की समाधानयुक्त विवेचना अपने वैचारिक लेखों में की है। भारतीय अर्थनीति कैसी हो, इसका स्वरूप क्या हो, इन सारे विषयों को पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने ‘भारतीय अर्थनीति विकास की दिशा’ में रखा है।

वे विकेन्द्रित व्यवस्था के पक्षधर थे। वे तमाम सामाजिक क्षेत्रों के राष्ट्रीयकरण के खिलाफ थे, जिनका राष्ट्रीयकरण तत्कालीन कांग्रेस सरकारों द्वारा धड़ल्ले से किया जा रहा था। वे जानते थे कि यह देश मेहनतकश लोगों का है, जो अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए राज्य पर आश्रित कभी नहीं रहे हैं। लेकिन समाजवादी नीतियों से प्रभावित कांग्रेस की सरकारों ने सत्ता की शक्ति का दायरा बढ़ाने की होड़ में समाज की ताकत को राष्ट्रीयकरण के बूते अपने शिकंजे में ले लिया। शिक्षा जैसी बात, जिसके सरकारीकरण का दीनदयाल जी ने विरोध किया है, उसका भी पूर्णतया सरकारीकरण कर दिया गया। आज सरकारी स्कूलों की हलात क्या है, ये किसी से छिपा नहीं है। शिक्षा देने का काम सरकार के हाथों में जाना बंदर के हाथ में उस्तरा देने जैसा साबित हुआ है। यह काम समाज पर छोड़ा जा सकता था, लेकिन समाजवादी नीतियों के अंध उत्साह ने उनकी एक न सुनी।

ऐसे में समाजवाद और साम्यवाद जैसी नीतियां भारत के लिए अव्यावहारिक हैं, यह बात पंडित दीनदयाल जी पचास साल पहले बता गए थे, जो आज सच साबित हो रही हैं। हम राज्य और सरकार के प्रति दिन-प्रतिदिन इतने आश्रित होते जा रहे हैं कि कल को अपने मुंह निवाला डालने के लिए भी हम सरकार से अपेक्षा करेंगे। समाजिक पंगुता के इस खतरे से बचने के लिए हमें दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन पर ही लौटना होगा। मानव के कल्याण का वही रास्ता शेष है।

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