गांधी जयंती: खादी मेरी शान है…कर्म ही मेरी पूजा…सत्य ही मेरा धर्म है… और हिंदुस्तान मेरी जान

जब भी हम अपने देश भारत के इतिहास की बात करते हैं, तो स्वतंत्रता संग्राम की बात जरुर होती हैं और इस स्वतंत्रता संग्राम में किन – किन सैनानियों ने अपना योगदान दिया, उन पर भी अवश्य चर्चाएँ होती हैं। इस स्वतंत्रता संग्राम में दो तरह के सेनानी हुआ करते थे।
पहले -: जो अंग्रेजों द्वारा किये जाने वाले अत्याचारों का जवाब उन्हीं की तरह खून – खराबा करके देना चाहते थे, इनमें प्रमुख थे -: चंद्रशेखर आज़ाद, सरदार भगत सिंह, आदि।

दूसरे तरह के सेनानी थे -: जो इस खूनी मंज़र के बजाय शांति की राह पर चलकर देश को आज़ादी दिलाना चाहते थे, इनमें सबसे प्रमुख नाम हैं-: महात्मा गांधी का। उनके इसी शांति, सत्य और अहिंसा का पालन करने वाले रवैये के कारण लोग उन्हें ‘महात्मा’ संबोधित करने लगे थे। आइये हम इस महात्मा के बारे में और भी जानकारियां साझा करते हैं -:

राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गांधी का पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। सम्पूर्ण भारतवर्ष आपको प्‍यार से बापू पुकारता है। उनका जन्म 2 अक्‍टूबर को पोरबंदर में हुआ था। देश की स्वतंत्रता में आपकी विशेष भूमिका रही है। गांधीजी के पिता करमचंद गांधी राजकोट के दीवान थे। आपकी माता का नाम पुतलीबाई था। वह धार्मिक विचारों वाली महिला थीं।

आपने स्वतंत्रता के लिए सदैव सत्‍य और अहिंसा का मार्ग चुना और आंदोलन किए। गांधीजी ने वकालत की शिक्षा इंग्‍लैंड में ली थी। वहां से लौटने के बाद आपने बंबई में वकालत शुरू की। महात्‍मा गांधी सत्‍य और अहिंसा के पुजारी थे। गांधीजी की 30 जनवरी को प्रार्थना सभा में नाथूराम विनायक गोडसे ने गोली मारकर हत्‍या कर दी। महात्‍मा गांधी की समाधि दिल्ली के राजघाट में है।

मोहनदास करमचंद गांधी ने सत्य और अहिंसा को अपना ऐसा मारक और अचूक हथियार बनाया जिसके आगे दुनिया के सबसे ताकतवर ब्रिटिश साम्राज्य को भी घुटने टेकने पड़े। आज उनकी 149वीं जयंती के मौके पर आइये हम यह जानने की कोशिश करते हैं कि पोरबंदर के मोहनदास को उनके जीवन के किन महत्वपूर्ण पड़ावों और घटनाओं ने महात्मा बना दिया।

मोहन दास के जीवन पर पिता करमचंद गांधी से ज्यादा उनकी माता पुतली बाई के धार्मिक संस्कारों का प्रभाव पड़ा। बचपन में सत्य हरिश्चंद्र और श्रवण कुमार की कथाओं ने उनके जीवन पर इतना गहरा असर डाला कि उन्होंने इन्हीं आदर्शों को अपना मार्ग बना लिया। जिस पर चलते हुए बापू देश के राष्ट्रपिता बन गए।

वर्ष 1883 में कस्तूरबा से उनका विवाह के दो साल बाद उनके पिता का देहांत हो गया। राजकोट के अल्फ्रेड हाई स्कूल और भावनगर के शामलदास स्कूल में शुरुआती पढ़ाई पूरी कर मोहन दास 1888 में बैरिस्टरी की पढ़ाई के लिए यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन पहुंच गए। स्वदेश लौटकर बंबई में वकालत शुरू की, लेकिन खास सफलता नहीं मिलने पर 1893 में वकालत करने दक्षिण अफ्रीका चले गए। यहां गांधी को अंग्रेजों के भारतीयों के साथ जारी भेदभाव का अनुभव हुआ और उन्हें इसके खिलाफ संघर्ष को प्रेरित किया। दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उनकी कामयाबी ने गांधी को भारत में भी मशहूर कर दिया और वर्ष 1917 में उन्होंने चंपारण के नील किसानों पर अंग्रेजों के अत्याचार के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। इसके बाद तो गांधी जी के जीवन का एकमात्र लक्ष्य ही ब्रितानी हुकूमत को देश के बाहर खदेड़ना बन गया। आखिर 15 अगस्त 1947 को देश को आजादी मिली और पूरे देश ने उन्हें अपना ‘राष्ट्रपिता’ माना।

इन आंदोलनों से अंग्रेजी हुकूमत को हिला दिया

असहयोग आंदोलन (1920)

दमनकारी रॉलेट एक्ट और जालियांवाला बाग संहार की पृष्ठभूमि में गांधी ने भारतीयों से ब्रिटिश हुकूमत के साथ किसी तरह का सहयोग नहीं करने के आह्वान के साथ यह आंदोलन शुरू किया। इस पर हजारों लोगों ने स्कूल-कॉलेज और नौकरियां छोड़ दीं।

सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930)

स्वशासन और आंदोलनकारियों की रिहाई की मांग व साइमन कमीशन के खिलाफ इस आंदोलन में गांधी ने सरकार के किसी भी आदेश को नहीं मानने का आह्वान किया। सरकारी संस्थानों और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया।

भारत छोड़ो आंदोलन (1942)

गांधी जी के नेतृत्व में यह सबसे बड़ा आंदोलन था। गांधी ने 8 अगस्त 1942 की रात अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के बंबई सत्र में ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नारा दिया। आंदोलन पूरे देश में भड़क उठा और कई जगहों पर सरकार का शासन समाप्त कर दिया गया।

तीन यात्राओं ने गांधी को जनता से जोड़ा

भारत यात्रा : गांधी जी ने गोपालकृष्ण गोखले की सलाह पर स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल होने से पहले देश का आंखों देखा हाल जानने के मकसद से पूरे देश का भ्रमण किया।

चंपारण यात्रा : राजकुमार शुक्ल की गुहार पर गांधी जी अप्रैल 1917 में चंपारण पहुंचे और वहां के नील किसानों पर अंग्रेजों के अत्याचार को अपनी आंखों देखा और उसके खिलाफ निर्णायक लड़ाई का नेतृत्व किया।

दांडी यात्रा : ब्रिटिश सरकार ने नमक बनाने पर कानूनी रोक लगा दी। इसके खिलाफ गांधी जी ने साबरमती आश्रम से दांडी समुद्र तट करीब 400 किलोमीटर दूरी पैदल तय की और वहां नमक बनाकर कानून तोड़ा। यह यात्रा 12 मार्च 1930 से 6 अप्रैल 1930 तक चली।

गांधी जी के अनमोल विचार

1— महात्मा गाँधी, एक ऐसा नाम जिसे भारत ही नहीं पुरे दुनिया में किसी परिचय की ज़रूरत नहीं। सत्य और अहिंसा का पुजारी जिसने बिना शस्त्र उठाये अंग्रेजों को झुका दिया और भारत को आजाद करा दिया।

2— व्यक्ति अपने विचारों से निर्मित प्राणी है, वह जो सोचता है वही बन जाता है।

3— अपने प्रयोजन में दृढ विश्वास रखने वाला एक सूक्ष्म शरीर इतिहास के रुख को बदल सकता है।

4— हमेशा अपने विचारों, शब्दों और कर्म के पूर्ण सामंजस्य का लक्ष्य रखेंं। हमेशा अपने विचारों को शुद्ध करने का लक्ष्य रखें और सब कुछ ठीक हो जायेगा।

5— थोडा सा अभ्यास बहुत सारे उपदेशों से बेहतर है।

6— खुद वो बदलाव बनिए जो आप दुनिया में देखना चाहते हैं।

7— विश्वास को हमेशा तर्क से तौलना चाहिए। जब विश्वास अँधा हो जाता है तो मर जाता है।

8— जब तक गलती करने की स्वतंत्रता ना हो तब तक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है।
ख़ुशी तब मिलेगी जब आप जो सोचते हैं, जो कहते हैं और जो करते हैं, सामंजस्य में हों।

9— विश्व के सभी धर्म, भले ही और चीजों में अंतर रखते हों, लेकिन सभी इस बात पर एकमत हैं कि दुनिया में कुछ नहीं बस सत्य जीवित रहता है।

10— मेरा धर्म सत्य और अहिंसा पर आधारित है। सत्य मेरा भगवान है। अहिंसा उसे पाने का साधन।

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