क्या आप के मौहल्ले में भी है चकला???

अनम इब्राहिम

चक्लो पर चमेली का अब दौर कहां क्योंकि बदलते ज़माने की रफ़्तार ने चक्लो और वैश्यालयो की शक्ल ही बदल डाली। चमेली, चंपा, चन्दा अब हुए नाम पुराने न ही अब मुन्नी के कोठे पर मुजरे के ठुमके लगते हैं न ही अब चक्लो की चाली में चम्पा बालो में चमेली लगा कर ख़डी होती हैं न ही चक्लो की चाची चारपाई पर बैठ मुँह में पान दबा दलाली का दरबार लगाती हैं। अब जब चक्लो कोठो और वैश्यालयो पर ठुक गए ताले तो सबसे बड़ा सवाल यह उठता हैं की गरम गोश्त के शौक़ीन रंगीन मिजाज़,मवाली,मनचले नवाबजादे,शरीफजादे जिस्म का सौदा करने वाले खरीददार अब कहा गए? बस यही सोच कर मैं तहक़ीक़ात की दिशा में शहर के अंदर दाखिल हो गया। फिर क्या था शहर की हर एक दरों-दीवार, बाज़ार व तनहा ठिकानों से आँखे चार की। दरवाज़ों, खिड़कियों और रोशनदानों से फूटकर निकलती हुई हर रोशनियो की किरचियो से भी सवाल किया। सबकी सब शर्मिन्दा होते हुए मुझे देख मुस्कुराने लगे कहा अनम इब्राहिम कैसे रिपोर्टर हो…… बस यह कहते हुए मुझसे मुँह फेर लिया। साला अख्खा शहर की शहर मुझ पर हसने लगा और हंसी के गूँजते हुए लम्हे ने वक्त के पलटते हुए पन्नो को मेरे सामने खोलकर रख दिया। चकले, चमेली, चाची रंगीनियत का लुफ्त उठाने वाले शरीफजादे सबकी सब एक नए बहरूपिये हुलिए में नज़र आने लगे। कोठे चकले वैश्यालय ने समाज की आँखों में धूल झोकने के लिए मसाज पार्लर, ब्यूटी पार्लर, छोटी-मोटी लाज व शरीफो के मोहल्लो में किराए के मकानों की शक्लो-सूरत में संचालित होने लगे। इन ठिकानों पर दलाल चाची अब मैडम आंटी बन गयी और चमेली,चंपा चंदा अब मुस्कान, जन्नत, हया वगैरह-वगैरह नामो से शराफत झलकाने की कोशिश करने लगी।

 

अब रहा बड़ा सवाल इस ज़िंदा गोश्त के गंदे धन्देबाज़ो के खरीददारो का तो उन्होंने अब दौलतमंदों,ओहदेदारों व समाज के शरीफ सत्यवादियों के बीच शराफ़त का लिहाफ़ लपेट लिया हैं। आखिर किस की शह पर पनप रहा हैं ये जिस्मानी धंदा? क्यों शासन इसे कर रहा हैं नज़रअंदाज़? इस दौर में कौन हैं चमड़े के जहाज़ का पायलट? समाज को शर्मसार करने वाले इस घिनोने धंदे से कौन निजात दिलाएगा? इस बुराई का असर कही न कही शहर के बाशिन्दों की ज़िन्दिगियो पर हो रहा हैं। गुज़रे हुए कुछ साल पहले तक देखने को मिलता था की वैलेंटाइन डे व कुछ अश्लीलता भरे नाच-गानों पर सियासतदानो के छर्रे फटाके फटकेबाज़ी दिखा देश-धर्म के संस्कार बचाने के नाम पर लाठिया लेकर घूमते थे, लेकिन अब इनको क्या सांप सुंग गया हैं जो इन्हे शहर भर में दिन-दुगुना और रात चौगुना होता हुआ जिस्म की खरीद फ़रोख़्त का धंदा नज़र नहीं आता?

 

मसाज ब्यूटी पार्लर, इन्शुरन्स व हॉस्पिटल नर्स की शक्ल में शहर की नामचीन कॉलोनीज में निजी और किराए के आवास में कौन कर रहा और करवा रहा गरम गोश्त का धंदा? कौन-कौन हैं चमड़े के जहाज़ के पाएलेट? शासन के चंद सफेद पोशाक अधिकारियों के अय्याशी के अड्डों में होटल, फार्म हाउस और शाही कोठियों से लेकर मुंबई, दिल्ली और हैदराबाद की पांच सितारा होटलो तक की चकाचोंध रँगीनमिज़ाजी के चटपटे किस्सों के कारनामे -जनसम्पर्क-life- की आगामी ख़बरों में पढ़िए और देखिए…

तब तक के लिए अपने मौहल्ले, गली और पड़ोस में तहक़ीक़ कीजिए कहीं आप के आसपास भी तो नही चल रहा है चमड़े का जहाज़…..

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